नशा हे ख़राब : झन पीहू शराब


"न्यूज ब्लॉग में आपका स्वागत है" ..... जल है तो कल है "....." नशा हे ख़राब : झन पीहू शराब " ..... - अशोक बजाज
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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

पलायन मुक्त हुआ छत्तीसगढ़

डाॅ. रमन सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष लेख 

छत्तीसगढ़ की प्रथम निर्वाचित सरकार ने डाॅ. रमन सिंह के नेतृत्व में 12 वर्ष पूर्ण कर लिये हैं। किसी भी सरकार के कामकाज के मूल्यांकन के लिए 12 वर्ष पर्याप्त है लेकिन जिस सरकार को बेकारी, भूखमरी, पलायन एवं पिछड़ापन विरासत में मिला हो उस सरकार के कामकाज के मूल्यांकन के लिए 12 वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है। छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है। यहां के खेतिहर मजदूर लाखों की संख्या में प्रतिवर्ष अन्य राज्यों में पलायन करते थे। पदभार ग्रहण के समय छत्तीसगढ़ से पलायन को रोकना डाॅ. रमन सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती थी। इन बारह वर्षों में सरकार ने कृषि व ग्रामीण विकास की नीतियां बनाकर छत्तीसगढ़ को पलायनमुक्त राज्य बनाया। किसानों को उन्नत बीज प्रदान किया गया ताकि वे विपुल उत्पादन कर सके। इससे छत्तीसगढ़ अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बना। 

कृषि के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या रहती है कि खेती पूरी तरह मानसून के भरोसे रहती है लेकिन रमन सरकार की नीति के चलते सिंचाई रकबा बढ़ गया। किसानों को ना केवल बोर खनन के लिए बल्कि विद्युत व डीजल पंप खरीदने के लिए शासन ने अनुदान देना प्रारंभ किया। शाकम्भरी योजना के अंतर्गत लघु व सीमांत किसानों को 75 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान होने से विद्युत व डीजल पंपों की बाढ़ आ गई। किसान समृध्दि योजना के अंतर्गत किसानों को नलकूप खनन एवं पंप प्रतिस्थापित करने हेतु 25000 रू. से 43000 रू. तक के अनुदान का प्रावधान रखने से भूजल श्रोतों का उपयोग कृषि उत्पादन के लिए होने लगा। ये ही नहीं बल्कि वर्षा जल को रोकने के लिए नदी - नालों में एनीकट, नालाबंधान एवं स्टाॅप डेम बनाये गये। इसी का परिणाम है कि कृषि के क्षेत्र में मानसून की निर्भरता कम हुई और किसान अच्छी पैदावार लेने में सफल हुए।

 छत्तीसगढ़ के किसानों को खेती के लिए समुचित संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इन बारह वर्षाें में किसानों को सहकारी समितियों के माध्यम से मिलने वाले फसल ऋण पर ब्याज दर 13 प्रतिशत से घटाकर 9 प्रतिशत, बाद में 6 प्रतिशत फिर बाद में 3 प्रतिशत किया गया। पिछले 2 वर्षों से तो किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर फसल ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। इस वर्ष राज्य के 925504 किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर 2400 करोड़ रूपये का ऋण वितरित किया गया है। कृषि व किसानों के प्रति सरकार की उदार व प्रगतिशील नीतियों के चलते अन्न का भरपूर उत्पादन होने लगा। कृषि के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े फलस्वरूप छत्तीसगढ़ पूर्णतः पलायनमुक्त राज्य के रूप में स्थापित हुआ। 

इसी प्रकार ग्रामीण विकास की दिशा में शासन ने ठोस कदम उठाकर गांवों में बुनियादी सुविधाओं शिक्षा, स्वास्थ्य एवं संचार के साधन विकसित किये। शिक्षा को प्राथमिकता देने का ही यह परिणाम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अप्रवेशी एवं शाला त्यागी बच्चों की संख्या दिनोंदिन घटती जा रही है। इन बारह वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों व उपस्वास्थ्य केन्द्रों के अलावा आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थापना की गई तथा कुपोषण को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाया गया।

डाॅ. रमन सरकार ने गरीबों को चिंतामुक्त करते हुए सस्ते चांवल की योजना बनाई जो गरीबी व पलायन को रोकने में काफी कारगर सिध्द हुई है। इस योजना से राज्य की आधी से अधिक आबादी लाभान्वित हो रही है। यही कारण है कि आज छत्तीसगढ़ की जनता के दिल में प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅं रमन सिंह चाउर वाले बाबा के रूप में स्थापित हो गए हैं। 

अतः हम कह सकते हैं कि डाॅ. रमन सिंह के कुशल नेतृत्व व प्रगतिशील नीतियों के चलते नवोदित छत्तीसगढ़ बीमारू राज्य से विकसित राज्य की श्रेणी में आ गया है। आज समूचे देश में छत्तीसगढ़ की नीतियों, कार्यक्रमों एवं योजनाओं का ना केवल जिक्र हो रहा है बल्कि उनका अनुसरण भी हो रहा है। जो अपने आप में सफलता का परिचायक है। हमें यह कहने में भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि छत्तीसगढ़ की राजनीतिक क्षितीज में डाॅ. रमन सिंह अंगद के पांव की तरह स्थापित हो चुके हैं। 

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

भाजपा : शून्य से शिखर तक

  स्थापना दिवस 6 अप्रेल पर विशेष
  
विश्व की राजनीतिक धरा पर विशाल वट-वृक्ष की तरह स्थापित भारतीय जनता पार्टी की सदस्य संख्या 10 करोड़ के करीब पहुंच चुकी है। वर्तमान में केन्द्र सहित अनेक राज्यों में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार होने के साथ-साथ भाजपा अब विश्व की सर्वाधिक सदस्य संख्या वाली पार्टी बनकर उभरी है। आज से 35 वर्ष पूर्व 6 अप्रैल 1980 को स्थापना के समय मुम्बई के प्रथम अधिवेशन में भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था  “भारत के पश्चिमी घाट को महिमा मंडित करने वाले महानगर के किनारे खड़े होकर मैं यहां भविष्यवाणी करने का साहस करता हूॅ कि अंधेरा छटेगा, सुरज निकलेगा, कमल खिलेगा......।“ श्री वाजपेयी द्वारा साहस और दृढ़ निश्चय के साथ कहे गये इन शब्दो में पार्टी और देश को नये उजाले की ओर ले जाने का संकल्प प्रतिध्वनित हो रहा था। देश की वर्तमान राजनैतिक स्थिति को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री वाजपेयी की 35 वर्ष पूर्व की गई भविष्यवाणी खरी उतरी है। 

अतीत में देश की राजनीति में कांग्रेस का दबदबा रहा है। केन्द्र के साथ-साथ कश्मीर से कन्याकुमारी तक लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस स्थापित थी। लेकिन भाजपा की आंधी में कांग्रेस का चमन नेस्नाबूत हो चुका है। 1984 में हुए आठवीं लोकसभा के चुनाव में महज दो सीटें हासिल करने वाली भाजपा ने 2014 के आम चुनाव में 282 सीटे जीत कर देश की राजनीतिक फिजा ही बदल दी। भाजपा को इस मुकाम पर पहुंचने के लिए काफी लम्बा संर्घष करना पड़ा है। इस अवधि में पार्टी ने अनेक झंझावातो का सामना किया तथा असंख्य समर्पित, निष्ठावान एवं जीवट कार्यकर्ताओ की बदौलत प्रतिकूलता को अनुकुलता में तब्दील किया। 

भारतीय जनता पार्टी केवल एक राजनैतिक पार्टी नही बल्कि एक विचारधारा है जो भारतीय जनसंघ की नीतियों व सिद्धांतों पर बनी है। डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति तथा कथित धर्मनिरपेक्ष की राजनीति के चलते 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना कि थी। परन्तुं 1977 के राजनीतिक हालातो के कारण सभी गैर कांग्रेसी दलो ने अपनी-अपनी पार्टियों को मिलाकर जनता पार्टी नाम से एक नई पार्टी का गठन किया जिसमें जनसंघ भी शामिल था। सामूहिक ताकत से कांग्रेस देशभर में विशेष कर उत्तर-भारत में पूरी तरह उखड़ गई। देश में नई उम्मीद व विकल्प लेकर आई जनता पार्टी की सरकार मात्र ढाई वर्ष में टूट गई, फलस्वरूप पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के नेताओं ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी के नाम से नई पार्टी का गठन किया।
1980 से अब तक के सफर में भारतीय जनता पार्टी को अनेको बार धूप-छांव का सामना करना पड़ा। स्थापना के बाद हुए 1984 के आम चुनाव में भाजपा को मात्र 2 सीटे मिली थी. हालांकि यह तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानूभूति का नतीजा था। तब भाजपा के विरोधी भाजपा  नेताओं पर फब्ती कसते हुए कहते थे “हम दो हमारे दो“ इन फब्तियो की परवाह न करते हुए भाजपा कार्यकर्ताओ ने अटल-अडवाणी के नेेतृत्व में अपनी संघर्ष यात्रा को अनवरत् जारी रखा। फलस्वरूप 1989 के आम चुनाव में लोकसभा में भाजपा सांसदों की संख्या दो से बढ़कर 85 हो गई। इसके बाद रामजन्म भूमि आंदोलन के चलते कांग्रेस सिमटती गई तथा भाजपा की ताकत में इजाफा होता गया। नतीजन 1991 में 120, 1996 में 161, 1998 में 182, 1999 में भी 182, 2004 में 138, तथा 2009 में भाजपा को लोकसभा में 116 सीटे हासिल हुई। परन्तु 2014 के आमचुनाव में भाजपा एक शक्तिशाली राजनैतिक पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई। इस चुनाव में पार्टी ने 275 सीटो का लक्ष्य रखा था। लेकिन परिणाम आया तो पता चला कि कांग्रेस एवं अनेक क्षेत्रीय पार्टियाॅं के चारो खाने चित्त हो गई। भाजपा ने अकेले 31 प्रतिशत वोट पाकर 282 सीटो पर जीत हासिल की तथा सहयोगी दलो को मिलाकर राजग के सांसदो की संख्या 300 पार कर गई। 

वास्तव में यह जादूई आंकड़ा नरेन्द्र मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व के कारण सम्भव हो सका है। 2014 का आमचुनाव ऐसे समय में हुआ जब देश की जनता का भरोसा कांग्रेसनीत यू.पी.ए. से टूट चुका था। बेलगाम होती महंगाई एवं अनियंत्रित भ्रष्ट्राचार की वजह से गण का विश्वास तंत्र से टूट चुका था। ऐसे समय में भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर जनता के मन में नये विश्वास को जागृत किया। श्री मोदी का नाम आते ही देश की तरूणाई ने अंगड़ाई ली और भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाकर सत्ता की मंजिल तक पहुंचाया। फलस्वरूप केन्द्र में गठबंधन सरकारों का दौर समाप्त हुआ और केन्द्र में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की प्रथम सरकार स्थापित हुई। इसके पूर्व 1996, 1998 व 1999 में अटल जी के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन की सरकार बनी थी। लेकिन तब अकेले भाजपा को दो-तिहाई बहुमत हासिल नही हुआ था। लेकिन 2014 के चुनाव में भारत की जनता ने राजनीति के सरोवर में कमल ही कमल खिलाया है। भाजपा की इस कामयाबी तथा नरेन्द्र मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व से सारा विश्व आश्चर्य चकित है। आम जनता को भी पूरा भरोसा है कि केन्द्र में भाजपा का दबदबा कायम होने से देश की दशा व दिशा बदलेगी।  
  लेखक - अशोक बजाज

Tarun chhattisgarh raipur, 6.4.2015
prakhar sanachar 6.4.2015
                                                                                                                     
dainik agradoot raipur, 6.4.2015

Haribhoomi Raipur 6.4.2015







बुधवार, 4 मार्च 2015

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

भारतीय संस्कृति का मौलिक चित्रण है एकात्म मानववाद

                                                                                                                    
असाधारण व्यक्तित्व के धनी पं. दीनदयाल उपाध्याय एक महान देशभक्त, कुशल संगठनकर्ता, मौलिक विचारक, दूरदर्शी, राजनीतिज्ञ ,पत्रकार और प्रबुद्ध साहित्यकार थे. आजादी के बाद देश की दशा पर उन्होंने गहन चिंतन किया तथा पूंजीवाद, साम्यवाद और समाजवाद के मुकाबले एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत किया. एकात्म मानववाद में भारतीय संस्कृति का मौलिक चित्रण है , भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण एकात्मवादी होने के कारण ही वह  सम्पूर्ण जीवन तथा सम्पूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है. टुकड़ों-टुकड़ों में विचार करना विशेषज्ञों की दृष्टि से उचित हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं.  अग्रेजी शासन की दासता से मुक्ति पाने के बाद हमारी प्राथमिकता आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य से देशवाशियों को इसकी आत्मानुभूति नहीं हुई. संस्कृति हमारे देश की आत्मा है तथा वह सदैव गतिमान रहती है. इसकी सार्थकता तभी है जब देश की जनता को उसकी आत्मानुभूति हो. देश को किस मार्ग पर चलना चाहिए इस पर चिंतकों में मतभेद था कुछ अर्थवादी ,कुछ राजनीतिवादी तथा कुछ मतवादी दृष्टिकोण के थे , इनमें से अलग हट कर पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जोर दिया उन्होनें कहा कि संस्कृति-प्रधान जीवन की विशेषता यह है कि इसमें जीवन के मौलिक तत्वों पर तो जोर दिया जाता है पर शेष बाह्य बातों के संबंध में प्रत्येक को स्वतंत्रता रहती है. इसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्येक क्षेत्र में विकास होता है. संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है. इस संस्कृति को ही हमारे देश में धर्म कहा गया है. जब हम कहतें है कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मज़हब, मत या रिलीजन नहीं, अपितु यह संस्कृति ही है.

अंग्रेजी शासन काल में सबका लक्ष्य एक था ”स्वराज” लाना लेकिन स्वराज के बाद हमारा रूप क्या होगा ? हम किस दिशा में आगे बढे़गे ? इस बात पर ज्यादा विचार ही नहीं हुआ.  पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 1964 में कहा था कि हमें ”स्व” का विचार करने की आवश्यकता है. बिना उसके ”स्वराज्य” का कोई अर्थ नहीं.  स्वतन्त्रता हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती। जब तक हमें अपनी असलियत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और न उनका विकास ही संभव है. परतंत्रता में समाज का ”स्व”दब जाता है.  इसीलिए राष्ट्र स्वराज्य की कामना करता हैं जिससे वे अपनी प्रकृति और गुणधर्म के अनुसार प्रयत्न करते हुए सुख की अनुभूति कर सकें. प्रकृति बलवती होती है, उसके प्रतिकुल काम करने से अथवा उसकी ओर दुर्लक्ष्य करने से नाना प्रकार के कष्ट होते हैं. प्रकृति का उन्नयन कर उसे संस्कृति बनाया जा सकता है, पर उसकी अवहेलना नहीं की जा सकती. आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि किस प्रकार मानव-प्रकृति एवं भावों की अवहेलना से व्यक्ति के जीवन में अनेक रोग पैदा हो जाते हैं, ऐसा व्यक्ति प्रायः उदासीन एवं अनमना रहता है. उसकी कर्म-शक्ति या तो क्षीण हो जाती है अथवा विकृत होकर वि-पथगामिनी बन जाती है. व्यक्ति के समान राष्ट्र भी प्रकृति के प्रतिकूल चलने पर अनेक प्रकार की व्याधियों का शिकार हो जाता है, आज भारत की अनेक समस्याओं का मूल कारण यही है.

 पं. दीनदयाल उपाध्याय ने मानव शरीर को आधार बना कर राष्ट्र के समग्र विकास की परिकल्पना की. उन्होनें कहा कि मानव के चार प्रत्यय है पहला मानव का शरीर , दूसरा मानव का मन , तीसरा मानव की बुद्धि और चौथा मानव की आत्मा. ये चारोँ पुष्ट होंगें तभी मानव का समग्र विकास माना जायेगा. इनमें से किसी एक में थोड़ी भी गड़बड़ है तो मनुष्य का विकास अधूरा है. जैसे यदि किसी के शरीर में कष्ट हो और उसे 56 भोग दिया जाय तो उसकी खाने में रूचि नहीं होगी. यदि कोई व्यक्ति बहुत ही स्वादिस्ट भोजन कर रहा है उसी समय यदि कोई अप्रिय समाचार मिल जाय तो उसका मन खिन्न हो जायेगा. भोजन तो समाचार मिलने के पूर्व जैसा स्वादिस्ट था अब भी वैसा ही स्वादिस्ट है लेकिन अप्रिय समाचार से व्यक्ति का मन खिन्न हो गया इसीलिये उसके लिए भोजन क्लिष्ट हो गया. यानी भोजन करते वक्त “आत्मा” को जो सुख मिल रहा था वह मन के दुखी होने से समाप्त हो गया. पं. दीनदयाल जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा ये चारोँ ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. 

जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है , बुद्धि हाथ को कांटा निकालने के लिए निर्देशित करती है और हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और कांटें को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यतः मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारोँ की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद की संज्ञा दी. उन्होंने मनुष्य की इस प्रवृति को राष्ट्र के परिपेक्ष्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि राष्ट्र की स्वाभाविक प्रवृति ही उसकी संस्कृति है. उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा. भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी. विश्व को यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं. राजनीति अथवा अर्थनीति शायद हमको उनसे ही उल्टे कुछ सीखना पड़े.  पं. उपाध्याय ने कहा कि अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है. इसी भावना के साथ हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं. 

                                                                          लेखक - अशोक बजाज , पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत रायपुर 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

तरंगों को किसी देश की सीमा से नहीं बांधा जा सकता

श्रोता दिवस पर अखिल भारतीय श्रोता सम्मलेन व प्रदर्शनी का आयोजन
(LISTENERS DAY , 20 August)


सम्मलेन को संबोधित करते हुए 
रेडियो श्रोता दिवस के अवसर पर भाटापारा में 20 अगस्त को अखिल भारतीय श्रोता सम्मलेन एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. यह सम्मलेन भाटापारा के अग्रसेन भवन में हुआ. जिसमें देश भर के लगभग 300 श्रोताओं ने भाग लिया. कार्यक्रम में पुराने फिल्मों के एलबम, प्राचीन वाद्य यंत्रो, देश भर में पाए जाने वाले पत्थरों, पुराने सिक्कों एवं पिछले कार्यक्रमों के तस्वीरों की नयनाभिराम प्रदर्शनी भी लगाई गई. गीत- संगीत का भी रोचक कार्यक्रम हुआ तथा पुराने फ़िल्मी गीतों के संग्रह की सी.डी. का विमोचन किया गया. कार्यक्रम के दौरान रायपुर से पधारी श्रीमती आशा जैन ने सर्वाईकल कैंसर एवं आहार विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रतिभागियों को प्रदान की.   

आयोजक मंडल ने छत्तीसगढ़ लिसनर्स क्लब के संयोजक के नाते मुझे मुख्य अतिथि बनाया था, जबकि अध्यक्षता विधायक श्री शिवरतन शर्मा ने की. कार्यक्रम में विविध भारती मुंबई के एनाउन्सर श्री कमल शर्मा एवं श्री राजेंद्र त्रिपाठी के अलावा आकाशवाणी बिलासपुर तथा अम्बीकापुर के एनाउन्सर व कम्पीयर विशेष रूप से उपस्थित थे. 

मुख्य अतिथि के नाते अंत में मुझे अंत में बोलने का अवसर दिया गया. मैनें श्रोता बंधुओं एवं बहनों से कहा कि संचार क्रांति के इस युग में रेडियो की महत्ता आज भी कायम है विशेषकर भारत जैसे विकासशील देश में रेडियो आज भी प्रासंगिक है. मैनें विभिन्न देशों के रेडियो स्टेशनों द्वारा चलाये जा रहे हिन्दी सर्विस का जिक्र करते हुए कहा कि लोग भले ही अपने अपने देश की सीमाओं से बंधें हो लेकिन तरंगों को किसी देश की सीमा से नहीं बांधा जा सकता. आज दुनिया में संचार के अनेक साधन विकसित हो चुके है परन्तु उसमें फूहड़ता व अश्लीलता ज्यादा होती है, यही वजह है कि आज समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है. टेलीविजन के कार्यक्रमों को हम भले ही परिवार सहित बैठकर नहीं देख सकते हो लेकिन रेडियों के कार्यक्रमों को हम परिवार सहित बैठकर सुन सकते है. यहाँ पर भाटापारा के श्रोताओं की प्रशंसा करना आवश्यक था क्योंकि यहाँ के श्रोताओं की सजगता, सक्रियता व जागरुकता के कारण इस शहर की कीर्ति चारों तरफ फैली हुई है. 

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि छत्तीसगढ़ से प्रारंभ हुई श्रोता दिवस मनाने की परंपरा अब पूरे देश में शुरु हो चुकी है. लिसनर्स-डे मनाने की परंपरा की शुरुवात वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ के श्रोताओं ने की थी तथा देश भर के श्रोताओ से 20 अगस्त को यह पर्व मनाने की अपील की थी. फलस्वरूप यह पर्व अब देश के अधिकांश हिस्सों में मनाया जा रहा है. ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन से श्रोताओं में जाग्रति आ रही है. 

सम्मलेन में आकाशवाणी के एनाउन्सर श्रीमती संज्ञा टंडन, श्री हरिश्चन्द्र वाद्यकार, श्री महेंद्र साहू, लौकेश गुप्त, श्री आर. चिपरे के अलावा रेडियो के वरिष्ठ श्रोता श्री परसराम साहू, श्री हरमिंदर सिंह चावला, श्री बचकामल, श्री रतन जैन, श्री कमलकांत गुप्ता, श्री सुरेश सरवैय्या, श्री विनोद वंडलकर, श्री कमल थवानी, श्री सोहन जोशी, श्री प्रदीप जैन, श्री खरारी राम देवांगन, श्री सुनील मिश्रा, श्री माधव मिरी, श्री रेखचंद मल, श्री आर.सी.कामड़े, श्री ईश्वरीसाहू, श्री दिनेश वर्मा, श्री धरमदास वाधवानी, श्री पी.एस. वर्मा, श्री दुर्गाप्रसाद साहू, श्री प्रदीप चन्द्र, श्री भागवत वर्मा, श्री संतोष वैष्णव, श्री मोतीलाल यादव, श्री मोहन देवांगन, श्री अनिल ताम्रकार कटनी, श्री अखिलेश तिवारी जबलपुर, श्री महेंद्र सिंह कुरुक्षेत्र हरियाणा, श्री प्रकाश हिन्गोले नागपुर, श्री हनुमान दास साहू यवतमाल, श्री रामजी दुबे पश्चिम बंगाल, श्री चंद्रेश गौहर इंदौर, श्री  बलवंत वर्मा प्रमिलागंज मध्यप्रदेश प्रमुख रूप से उपस्थित थे. 

                               सम्मलेन की झलकियाँ 

संबोधन 

सी.डी. का विमोचन 

दीप प्रज्ज्वलन 

स्वागत 

पत्थरों की प्रदर्शनी 

फोटो व प्राचीन वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनी

प्राचीन वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनी

फोटो प्रदर्शनी

पुराने फिल्मों के पोस्टर 

श्रोता गण 

श्रोता गण

श्रोता गण

श्रोता गण

श्रोता गण

श्रोता गण

          कार्यक्रम से संबंधित प्रकाशित समाचारों की कतरनें                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        

दैनिक भास्कर रायपुर, 22.08.2014

दैनिक देशबंधु रायपुर, 22.08.2014

दैनिक हरिभूमि रायपुर, 22.08.2014

दैनिक नईदुनिया रायपुर, 22.08.2014

दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ रायपुर, 22.08.2014

दैनिक नवभारत रायपुर, 21.08.2014

आलेख / दैनिक नवभारत रायपुर, 21.08.2014

रविवार, 16 मार्च 2014

"होली" की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

सभी ब्लॉगर बहनों व भाइयों

 को 

रंग पर्व
 
"होली"
 
की 

हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

                                     आपका - अशोक बजाज

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

मनमीत जो घाव लगाये, उसे कौन मिटाये

                        

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के लिए दो चरणों में मतदान हो चुका है. पहले चरण में बस्तर संभाग के 12 क्षेत्रों एवं राजनांदगांव जिले के 6 क्षेत्रों कुल 18 सीटों के लिए 11 नवंबर को तथा शेष 72 क्षेत्रों के लिए 19 नवंबर को मतदान हुआ है. मतगणना 8 दिसंबर को होगी, मतदान और मतगणना के बीच लंबा अंतराल है. अतः परिणाम आने में अभी वक्त है. यही वजह है कि इन दिनों घात - प्रतिघात, भीतरघात - खुलाघात जैसी बातें सुर्खियाँ बन रही है. आश्चर्य की बात तो यह है कि कांग्रेस के नेता इन तमाम परिस्थितियों के बाद भी सत्ता में वापसी का सपना देख रहें है , मुख्यमंत्री कौन होगा ? विधायक दल के अन्दर का होगा अथवा बाहर का होगा ? रायपुर में तय होगा कि दिल्ली में तय होगा आदि आदि . यानी सूत न कपास जुलाहों में लट्ठा-लट्ठी.

खैर भीतरघात हो या खुलाघात ये बहुत बुरी चीज है. विधानसभा, लोकसभा ही नहीं पंचायतों एवं नगरीय निकायों के चुनाव में भी यह बीमारी घुस गई है. मै स्वयं 1998 के विधान सभा चुनाव में खुलाघात और भीतरघात का स्वाद चख चुका हूँ , तब मैंने भारतीय जनता पार्टी की टिकिट पर अभनपुर विधानसभा से चुनाव लड़ा था और बागी उम्मीदवार तथा भीतरघात के चलते लगभग 7000 मतों से हार गया था लेकिन 15 वर्षों से मैंने इसका जिक्र तक नहीं किया. मैंने सभी भीतरघातियों को धीरे- धीरे मुख्यधारा में लाकर उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दिया. आवश्यकता पड़ने पर उनकी मदद भी की. यह अलग बात है कि उस आघात का दुष्परिणाम मै आज तक भुगत रहा हूँ ---
 

किशोर दा का गाया फिल्म अमर प्रेम का यह गीत - 

हमसे मत पूछो कैसे, मंदिर टूटा सपनों का,
लोगों की बात नहीं है, ये किस्सा है अपनों का,
कोई दुश्मन ठेस लगाये, तो मीत जिया बहलाये,
मनमीत जो घाव लगाये, उसे कौन मिटाये.
चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाये
सावन जो अगन लगाये, उसे कौन बुझाये,